
जम्मू कश्मीर आतंकी हमला
– फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
‘जम्मू-कश्मीर’ में 10 जून से 12 जून के बीच ’72’ घंटे के दौरान तीन बड़े आतंकी हमले हुए हैं। मंगलवार रात को डोडा में शुरू हुआ एनकाउंटर अभी खत्म नहीं हुआ है। सेना के करीब आधा दर्जन जवान घायल बताए जा रहे हैं। हीरानगर एनकाउंटर में सीआरपीएफ की 121वीं बटालियन के जवान कबीर दास विकी ने सर्वोच्च बलिदान दिया है। सुरक्षा बलों द्वारा अलग-अलग जिलों में सर्च ऑपरेशन चलाया गया है। संदिग्ध आतंकियों के स्केच जारी हो रहे हैं। ऑपरेशन से जुड़े विश्वस्त सूत्रों का कहना है, 72 घंटे में तीन हमले, ये एक सोची समझी रणनीति है। पाकिस्तान से लगती अंतरराष्ट्रीय सीमा पर, ताजा घुसपैठ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। भले ही बॉर्डर पर सीजफायर लागू है, लेकिन इसके बावजूद पाकिस्तानी आतंकी संगठनों के सदस्य, जम्मू कश्मीर में प्रवेश कर रहे हैं। फोर्स के सूत्रों ने यह बात मानी है कि जम्मू-कश्मीर प्रशासन में आतंकियों को हर तरह की मदद पहुंचाने वाली ‘ब्लैक शीप’ (काली भेड़) मौजूद हैं। इनके चलते पड़ोसी मुल्क के दहशतगर्द, सुरक्षाबलों को नुकसान पहुंचाते हैं। ‘ब्लैक शीप’ की खोज और पहचान के लिए अलग से ऑपरेशन शुरू किया गया है।
घुसपैठ की संभावना से इनकार नहीं
पिछले कुछ समय से आतंकियों का फोकस, कश्मीर घाटी की बजाए, जम्मू क्षेत्र पर अधिक हो रहा है। रविवार को जम्मू के रियासी में आतंकवादियों ने शिवखोड़ी मंदिर से कटरा जा रहे तीर्थयात्रियों की एक बस को निशाना बनाया था। इस हमले में 10 लोगों की मौत हुई थी, जबकि तीन दर्जन से ज्यादा लोग घायल हो गए थे। सूत्रों का कहना है, एकाएक जम्मू की तरफ आतंकी संगठनों के हमलों में जो तेजी देखी जा रही है, उसके पीछे घुसपैठ की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। जम्मू कश्मीर पुलिस की खुफिया इकाई के सूत्रों का भी कहना है कि पाकिस्तान की तरफ से बड़ी घुसपैठ संभव है। ऐसा भी हो सकता है कि यह घुसपैठ एक ही बार न होकर, छोटे-छोटे अंतराल पर हुई हो। जम्मू-कश्मीर में आतंकियों पर सुरक्षाबलों का शिकंजा कसता जा रहा है। ऐसे में आतंकियों की नई भर्ती में भी काफी गिरावट आ गई है। पाकिस्तान के आतंकी संगठनों को घाटी में नए चेहरे नहीं मिल रहे हैं।
पुख्ता इनपुट जुटाकर करते हैं हमला
सूत्रों के अनुसार, इस स्थिति में पाकिस्तान के आतंकी संगठन, एक नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। वे हमले की रणनीति ऐसी बनाते हैं कि जिसमें सुरक्षा बलों को ज्यादा नुकसान हो। आमने-सामने की लड़ाई न हो। इस तरह की रणनीति में सुरक्षा बलों के वाहन, छोटे अस्थायी कैंप और नाके पर घात लगाकर हमला, शामिल हैं। जम्मू-कश्मीर के घने जंगलों में स्थित प्राचीन ‘भूलभुलैया’ गुफाओं में ’58’ पाकिस्तानी दहशतगर्द छिपे हैं। इनके अलावा लगभग 32 लोकल आतंकी भी उनके साथ हैं। गत दो वर्ष में पाकिस्तानी आतंकियों की रणनीति यही रही है कि वे समय के एक निर्धारित अंतराल के बाद पूरी तरह से पुख्ता इनपुट जुटाकर हमला करते हैं। दो वर्ष में हुए करीब आधा दर्जन ऐसे हमलों में सुरक्षा बलों को भारी नुकसान उठाना पड़ा है। आतंकी संगठन, सिक्योरिटी फोर्स की मूवमेंट से जुड़े इंटेलिजेंस इनपुट एकत्रित करते हैं। इनके पास जो संचार सिस्टम होता है, उसे ट्रैक करना आसान नहीं होता। वे आपसी बातचीत के लिए विभिन्न तरह के ‘एप’ का इस्तेमाल करते हैं।
कई दूसरे संगठन भी एक्टिव हो रहे हैं
इन दहशतगर्दों को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकी संगठन ‘लश्कर-ए-तैयबा’ की ‘द रेजिस्टेंस फ्रंट’ (टीआरएफ) और ‘जैश-ए-मोहम्मद’ की सक्रिय प्रॉक्सी विंग ‘पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट’ (पीएएफएफ) के माध्यम से मदद मिलती है। लोकल स्तर पर सक्रिय इन्हीं संगठनों को जम्मू-कश्मीर में आतंक की ‘ऑक्सीजन’ बताया जाता है। जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान के आतंकी संगठनों की मदद से कई दूसरे संगठन भी एक्टिव हो रहे हैं। इनमें यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट जम्मू कश्मीर (यूएलएफजेएंडके), मुजाहिद्दीन गजवत-उल-हिंद (एमजीएच), जम्मू कश्मीर फ्रीडम फाइटर्स (जेकेएफएफ) और कश्मीर टाइगर्स आदि शामिल हैं। पाकिस्तान से घुसपैठ के जरिए भारतीय सीमा में घुसे आतंकियों के बारे में सुरक्षा एजेंसियों को अधिक जानकारी नहीं मिल पाती है। वजह, वे जंगलों में छिपे रहते हैं। लोकल संगठनों की मदद से सुरक्षा बलों की आवाजाही के इनपुट जुटाते हैं। एक अंतराल के बाद ही किसी हमले को अंजाम देते हैं। इसके पीछे भी एक बड़ी वजह है। घाटी में अब लोकल स्तर पर नए आतंकियों की भर्ती में तेजी से कमी आ रही है। 2018 में 187 आतंकी, 2019 में 121, 2020 में 181, 2021 में 142 और 2022 में 91 आतंकी भर्ती हुए थे। इस साल वह संख्या, गिनती के आतंकियों तक सीमित है।
अब हाइब्रिड आतंकी बन रहे बड़ा खतरा
सुरक्षा बलों के एक वरिष्ठ अधिकारी बताते हैं, घाटी में अभी हाल-फिलहाल में कोई बड़ी घुसपैठ नहीं हुई है। संभव है कि ये सभी विदेशी आतंकी कई वर्षों से घाटी में कहीं पर छिपे हों। सुरक्षा बलों की वहां तक पहुंच न हो सकी हो। मौजूदा समय में जितने भी आतंकी सक्रिय हैं, वे जंगलों में छिपे बैठे हैं। जम्मू कश्मीर पुलिस, आईबी, आर्मी एवं अन्य एजेंसियां आतंकियों के ठिकाने तक पहुंचने का प्रयास कर रही हैं। इन आतंकियों को घाटी में किसी न किसी तरह की मदद तो मिल ही रही है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। सीमा पार के आतंकी संगठन, पाकिस्तानी आतंकियों को बचाना चाहते हैं। वे ज्यादा से ज्यादा हाइब्रिड आतंकी तैयार कर रहे हैं। हाइब्रिड आतंकियों की मदद से ही टारगेट किलिंग की वारदात को अंजाम दिया जाता है। ये आतंकी, पब्लिक के बीच ही अंडर ग्राउंड वर्कर बनकर काम करते हैं। इन पर पुलिस या आम जनता को शक नहीं होता, क्योंकि ये उनके बीच में ही रहते हैं।
लॉन्च पैड पर 60-70 घुसपैठिये तैयार
जम्मू कश्मीर के डीजीपी रश्मि रंजन स्वैन, यह बात कह चुके हैं कि नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार आतंकी संगठनों के कई लांच पैड एक्टिव हैं। वहां से लगभग 70 आतंकवादी, भारत में घुसपैठ करने के प्रयास में है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी, आईएसआई, इन आतंकियों को बॉर्डर के विभिन्न स्थानों से पांच-पांच के समूह में, जम्मू कश्मीर में पहुंचाने की कोशिश कर रही है। सेना, केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और जम्मू-कश्मीर पुलिस की सतर्कता से इन आतंकियों के प्रयास सफल नहीं हो रहे हैं। आतंकवाद का केंद्र बिंदु, अब स्थानीय दहशतदर्गों से विदेशी (पाकिस्तानी) आतंकियों की तरफ स्थानांतरित हो रहा है। लोकल युवा, आतंकी संगठनों से दूरी बना रहे हैं। ब्लैक शिप की पहचान का काम चल रहा है। विभिन्न सरकारी विभागों में ‘काली भेड़ों’ को पहचान कर उनके खिलाफ कार्रवाई की जा रही है। कई विभागों में सरकारी कर्मचारी, आतंकियों के मददगार हैं। ये बात सुरक्षा एजेंसियों और जम्मू कश्मीर प्रशासन को मालूम है।








